चीफ जस्टिस बोले- दुष्कर्म मामलों में महिलाओं को दंडित करें या नहीं, ये तय करना संसद का काम है; कोर्ट दखल नहीं देगा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें छेड़छाड़, यौन शोषण और दुष्कर्म जैसे मामलों में महिलाओं को भी दंडित करने के प्रावधान बनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि पुरुष भी छेड़छाड़ के शिकार होते हैं। उनका भी यौन शोषण होता है। कई मामलों में महिलाएं ही ऐसा करती हैं। इसलिए उन पर भी भारतीय दंड संहिता के तहत कानूनी सजा का प्रावधान होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि- ‘हम ये नहीं कह रहे कि महिलाएं, पुरुषों के साथ दुष्कर्म नहीं कर सकतीं, लेकिन उनका यह अपराध आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत आएगा। यौन शोषण और दुष्कर्म के मामलों में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह दंडित किया जा सके, इसके प्रावधान तय करने का काम संसद का है। सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ के सामने वकील ऋषि मल्होत्रा ने याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि- 158 साल पुरानी आईपीसी के अनुसार यौन शोषण, छेड़छाड़, दुष्कर्म का अपराध केवल पुरुष ही करते हैं। पुरुष भी महिलाओं के कारण यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म के पीड़ित हो सकते हैं। महिलाओं को भी पुरुषों की तरह दंडित किया जाना चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस मिश्रा ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए उनके पक्ष में बहुत से सकारात्मक प्रावधान हैं। हम आपके इस तर्क से सहमत नहीं हैं। हमें यह याचिका कल्पना पर आधारित लग रही है।
ऋषि मल्होत्रा ने संविधान के अनुच्छेद 15 का हवाला देते हुए कहा कि इसके मुताबिक देश के किसी भी नागरिक के साथ लिंग, धर्म, जाति, जन्म लेने के स्थान को लेकर भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया जिसमें कोर्ट ने व्याभिचार कानून पर फिर से विचार करने की सहमति जताई है और मामले को संविधान पीठ में भेजा गया है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विष्णु शंकर जैन बताते हैं- ‘अगर किसी पुरुष के साथ पुरुष दुष्कर्म करे, तो उसे भारतीय दंड संहिता की धारा-377 के तहत कुकर्म की संज्ञा दी गई है। इस अपराध में कठोर सजा का भी प्रावधान है। लेकिन अगर पुरुष के साथ इस तरह के किसी अपराध में महिलाओं के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे मामलों में जब तक शिकायत न हो, तब तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती। धारा 377 का कानूनी इस्तेमाल सीमित है। इसका उपयोग कभी-कभी पुरुषों के साथ असहमति से हुए सेक्स के मामलों में किया जाता है। इस धारा के तहत महिला-पुरुष के बीच होने वाले अप्राकृतिक सेक्स का अपराध भी शामिल है।