सम्मान से मरना भी मौलिक अधिकार, जानें SC के फैसले की बड़ी बातें

मल्टीमीडिया डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में इच्छामृत्यु को मंजूरी दे दी है। इस तरह अब भारत भी स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स, बेल्जियम जैसे देशों में शामिल हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को लेकर कुछ शर्तें भी तय की है। जैसे- लाइलाज बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पूरे होश में रहते हुए लिखित में इच्छामृत्यु मांग सकता है। सरकारी मेडिकल बोर्ड के सामने ही मरीज यह बात लिखेगा। इस कागज को कोर्ट में पेश किया जाएगा और वहांं से मंजूरी मिलने के बाद ही इच्छामृत्यु दी जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे शांति और सम्मानजनक तरीके से मरने का मौलिक अधिकार करार दिया है।

हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यदि मरीज कोमा में चला गया है या अपनी यह भावना जाहिर करने में सक्षम नहीं है तो क्या होगा?

जानिए बाकी देशों में कैसी व्यवस्था है

अमेरिका के कुछ राज्यों में इसकी मंजूरी है। जैसे ओरेगन, वॉशिंगटन और मोंटाना डॉक्टर की सलाह और उसकी मदद से मरने की इजाजत है। वहीं स्विट्जरलैंड में में यूं तो इच्छा मृत्यु गैर-कानूनी है, लेकिन व्यक्ति खुद को इंजेक्शन देकर जान दे सकता है।

नीदरलैंड्स में मरीज की मर्जी के बाद डॉक्टर उसे इच्छामृत्यु दे सकता है। वहीं बेल्जियम में सितंबर 2002 से इच्छामृत्यु वैधानिक हो चुकी है।

ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों सहित दुनिया के ज्यादातर देशों में इच्छामृत्यु गैर-कानूनी है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु VS सक्रिय इच्छामृत्यु

निष्क्रिय इच्छामृत्यु में मरीज जीवन रक्षक प्रणाली पर अचेत अवस्था में रहता है। वह तकनीकी तौर पर जिंदा रहता है, लेकिन शरीर और दिमाग निष्क्रिय होते हैं। इस स्थिति में परिवार की मंजूरी पर इच्छामृत्यु दी जा सकती है।

वहीं सक्रिय इच्छामृत्यु के मामले में मरीज खुद इच्छामृत्यु मांगता है। ऐसे मरीजों के ठीक होने की उम्मीद खत्म हो जाती है और उनके चाहते पर इच्छामृत्यु दी जा सकती है।